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गीता का निराकार भगवान शिव-शंकर भोलेनाथ या साकार श्रीकृष्ण की आत्मा उर्फ दादा लेखराज?

22 जुलाई

भारतीयों के लिए ढाई हज़ार साल से जीवन के हर क्षेत्र में मार्गदर्शक का कार्य करने वाली गीता सर्व शास्त्र शिरोमणि है, इस बात में कोई संदेह नहीं है, किंतु भारत के इतिहास में इसी गीता पर जितने विद्वानों और आचार्यों ने टीकाएँ लिखी हैं, उतनी शास्त्र पर नहीं लिखी गई होंगी, जो यह सिद्ध करता है कि यह शास्त्र ऐसा अनूठा है कि मनुष्यों द्वारा विभिन्न प्रकार से की गई इसकी व्याख्या ने सारे मनुष्यों को कभी संतुष्ट नहीं किया है। किसी ने सच ही कहा है ”कै जाने कवि या कै जाने रवि।” किसी कविता की सही व्याख्या उसका रचनाकार अर्थात् कवि ही कर सकता है अथवा ज्ञानसूर्य रवि कर सकता है। बाकी जितने भी मनुष्य उस कविता की जितनी भी व्याख्याएँ करें, वो किसी न किसी दृष्टिकोण से अधूरी ही होगी।

जन सामान्य के मन में तो यही बात बैठा दी गई है कि गीता के ज्ञानदाता श्रीकृष्ण थे, जिन्‍होंने द्वापरयुग में कुरूक्षेत्र की रणभूमि में रथ पर विराजमान होकर अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था, किंतु आध्यात्मिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें, तो गीता किसने, किसको, कब, कहाँ और कैसे सुनाई थी—ये सारे ही प्रश्न विवादास्पद हैं।

सर्वप्रथम प्रश्न तो यही उठता है कि गीता किसने और किसको सुनाई थी? गीता और सत्यनारायण की कथा यह सिद्ध करती है कि भगवान तो साधारण, बूढ़े और अनुभवी मनुष्य के रूप में प्रकट होते हैं। गीता में ही लिखा हुआ है –

  • अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।

परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥ 11 ॥ (अध्‍याय-9)

साथ ही, गीता में लिखा हुआ है कि ईश्वर तो अजन्मा, अभोक्‍ता और अव्यक्त है।

  • अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्‍वरोऽपि सन्।

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्‍भवाम्यात्ममायया॥ 6 ॥ (अध्‍याय-4)

  • यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।

असंमूढ: स मर्त्येषु सर्वपापै: प्रमुच्यते॥ 3 ॥ (अध्‍याय-10)

श्रीमद्भगवद्गीता में उसी आदि-अनादि पुरुष की स्तुति की गई है—(तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यत: प्रवृत्ति: प्रसृता पुराणी॥ 4 ॥ अध्‍याय-15) अर्थात् ‘मैं उस आदि-अनादि पुरुष को प्रणाम करता हूँ, जिससे इस संसार-वृक्ष की आदि प्रवृत्ति हुई है।’ गीता का वह आदि पुरुष स्वयं बता रहा है—(अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वश:॥ 2 ॥ अध्‍याय-10) अर्थात् ‘मैं ही देवों और महर्षियों, सबका आदि हूँ।’ उसी ने प्राचीनकाल में कर्मयोग की वह प्रसिद्ध निष्ठा प्रचलित की थी, जिसके कारण भारत को जैन परम्परानुसार भी कर्मभूमि की संज्ञा मिली है। (निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ…..कर्मयोगेन योगिनाम्॥ 3 ॥ अध्‍याय-3) यहाँ ध्यान रहे कि गीता का ज्ञान श्रीकृष्ण ने नहीं दिया था; अपितु उसी आदि-अनादि पुरुष ने गृहस्थ धर्म की शिक्षा के लिए गृहस्थ अर्जुन को सहज राजयोग सिखाने हेतु दिया था। इस बारे में अधिक विस्तार में न जाकर प्रकरणवश कुछ प्रसिद्ध इतिहासकारों के उद्धरण प्रस्तुत करते हैं—

होपकिन्स का विचार है—”(गीता का) अब जो कृष्णप्रधान रूप मिलता है, वह पहले कोई विष्णुप्रधान कविता थी और इससे भी पहले वह कोई एक निस्सम्प्रदाय रचना थी।” रिलीजन्स ऑफ इण्डिया (राधाकृष्णन गीता), रिलीजियस लिटरेचर ऑफ इण्डिया(1620) पृष्ठ-12-14 पर फर्कुहार ने लिखा है—”यह (गीता) एक पुरानी पद्य उपनिषद है, जो सम्भवत: श्वेताश्वतरोपनिषद के बाद लिखी गई है और जिसे किसी कवि ने कृष्णवाद के समर्थन के लिए ई0 सन् के बाद वर्तमान रूप में ढाल दिया है।” गर्वे के अनुसार, ”भगवद्गीता पहले एक सांख्य-योग सम्बन्धी ग्रंथ था, जिसमें बाद में कृष्णवासुदेव पूजा पद्धति आ मिली और ई0 पूर्व तीसरी शताब्दी में इसका मेलमिलाप कृष्ण को विष्णु का रूप मानकर वैदिक परम्परा के साथ बिठा दिया गया। मूल रचना ईस्वी पूर्व 200 में लिखी गई थी और इसका वर्तमान रूप ईसा की दूसरी शताब्दी में किसी वेदान्त के अनुयायी द्वारा तैयार किया गया है।” होल्ट्ज़मैन गीता को सर्वेश्वरवादी कविता का बाद में विष्णुप्रधान बनाया गया रूप मानता है। कीथ का भी विश्वास है कि  मूलत: गीता श्वेताश्वतर के ढंग की उपनिषद थी; परन्तु बाद में उसे कृष्णा पूजा के अनुकूल ढाल दिया गया। (राधाकृष्णन ‘गीता’ की भूमिका, पृष्ठ-17 से उद्धृत½

जबकि श्रीकृष्ण का तो माँ के गर्भ से जन्म हुआ था, उन्‍होंने जीवन के सभी सुखों का भोग किया, गुरू संदीपनी से शिक्षा प्राप्त की। उन्‍हें अधिकतर बाल्यावस्था में ही दिखाया गया है; इसलिए सारा संसार उन्‍हें अपने पिता के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता। दूसरी बात, पौराणिक कथाओं में प्रसिद्ध है कि द्वापरयुग में गीता श्रीकृष्ण ने केवल अर्जुन को एक रथ पर विराजमान होकर सुनाई, किंतु यह भी प्रसिद्ध है कि महर्षि व्यास ने महाभारत शास्त्र की रचना की, जो कि जन-जन तक संस्कृत में पहुँची। ऐतिहासिक दृष्टि से ये तथ्य विवादास्पद हैं।

  • अब गीता को जन्म किसने दिया है, यह है टॉपिक। जयन्ती कहते हैं तो ज़रूर जन्म भी हुआ ना। उनको जब कहते हैं, श्रीमद् भगवत गीता जयन्ती तो ज़रूर उनको जन्म देने वाला भी चाहिए ना। सब कहते हैं, श्रीकृष्ण भगवानुवाच। तो फिर श्रीकृष्ण पहले आता, गीता पीछे हो जाती। अब गीता का रचयिता ज़रूर चाहिए। अगर श्रीकृष्ण को कहते तो पहले श्रीकृष्‍ण, गीता पीछे आनी चाहिए; परन्‍तु श्रीकृष्‍ण तो छोटा बच्चा था वह गीता सुना ना सके। यह सिद्ध करना होगा कि गीता को जन्म देने वाला कौन? यह है गुह्य बात। भारत में कुछ रोला है सो इसी बात पर है। कृष्ण तो जन्म लेता है माता के गर्भ से। वह तो सतयुग का प्रिन्स है। (मु.24.11.88 पृ.1 आ.)

वास्तव में, गीता है तो सर्व शास्त्र शिरोमणि, किंतु वह द्वापरयुग में नहीं, अपितु 5000 वर्ष के चतुर्युगी मनुष्य सृष्टि रूपी चक्र में कलियुग के अंत और सतयुग की आदि अर्थात् पुरुषोत्तम संगमयुग में सुनाई गई थी, जिसकी अभी पुनरावृत्ति हो रही है। यदि गीता द्वापरयुग में ही सुनाई गई थी तो फिर पापी कलियुग कैसे आ गया? भगवान के अवतरण के पश्चात् तो सतयुग आना चाहिए था, न कि महापापी कलियुग और गीता सुनाई जाती है संगमयुग में, जबकि सृष्टि पर सारे धर्म, धर्मावलंबी और अपने-अपने अंतिम जन्मों में उन धर्मों के धर्मपिता भी विद्यमान होते हैं। तभी तो गीता में कहा गया है—सर्व धर्मों का त्याग कर मुझ एक परमात्मा की शरण में आ जा।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥ 66 ॥ (अध्‍याय-18)

हिन्दुओं के पारम्परिक दृष्टिकोण से तो जब द्वापरयुग में गीता सुनाई गई थी तब मुस्लिम, सिक्ख आदि धर्म तो नहीं थे। फिर गीता में उक्त श्लोक कैसे आ गया? और भगवान द्वारा गीता कोई संस्कृत-जैसी कठिन भाषा में नहीं सुनाई गई थी, वह तो सर्व साधारण को समझ में आने वाली भाषा, जैसे—हिन्दी, में सुनाई जा रही है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी देखें, तो संस्कृत कभी जन साधारण की भाषा नहीं रही है। फिर सर्वसाधारण मानुषी तन में आया हुआ भगवान भला ऐसी क्लिष्ट भाषा का प्रयोग कैसे कर सकता है? साथ ही, गीता श्री कृष्ण जैसे आकर्षक रूप-रंग वाले तथा पुनर्जन्म के चक्र में आने वाले किसी साकारी राजकुमार के द्वारा नहीं, अपितु अजन्मा, अभोक्ता, निराकार भगवान शिव द्वारा कलियुग के अंत में किसी साधारण मनुष्य तन (प्रजापिता ब्रह्मा) के द्वारा केवल एक अर्जुन को नहीं, अपितु अर्जुन-जैसे कई अन्य गृहस्थियों को दिया जा रहा है। गीता में लिखा है—हे अर्जुन, तू अपने जन्मों को नहीं जानता। मैं तुझे तेरे अनेक जन्मों की कहानी सुनाता हूँ।

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्‍वं वेत्थ परंतप॥ 5 ॥ (अध्‍याय-4)

किंतु, जो कृष्ण स्वयं जन्म और मरण के चक्र में आने वाला हो, वह अन्य मनुष्यात्माओं को सच्ची मुक्ति और जीवनमुक्ति का वर्सा कैसे दे सकता है और उनके अनेक जन्मों की कहानी कैसे सुना सकता है? इससे सिद्ध होता है कि अनेक जन्मों की कहानी साकारी श्री कृष्ण द्वारा नहीं, अपितु अजन्मा परमात्मा शिव द्वारा सुनाई जाती है, जो कि गीता या अमरकथा के रूप में प्रसिद्ध है।

गीता के संबंध में उपर्युक्त मत, जो कि आम धारणा से पूर्णतया भिन्न है, ब्रह्माकुमारी संस्था के साथ-साथ कंपिला, उत्तर प्रदेश स्थित आध्यात्मिक ईश्वरीय विश्वविद्यालय का भी यही मत है कि सन् 1936-37 से प्रारंभ हुए पुरुषोत्तम संगमयुग पर निराकार भगवान शिव द्वारा अपने अति साधारण साकार मनुष्य रथ के द्वारा सुनाया गया ईश्वरीय ज्ञान, जिसे मुरली कहा जाता है, वही सच्ची गीता है, जिसके आधार पर ढाई हज़ार साल बाद प्रारंभ होने वाले द्वापरयुग में, संस्कृत की गीता लिखी जाएगी। हालाँकि ब्रह्माकुमारी संस्था यह तो मानती है कि निराकार शिव ही गीता के भगवान है, किंतु वह दादा लेखराज ब्रहमा उर्फ कृष्ण की आत्मा को ही संसार भर में भगवान के साकार माध्यम के रूप में प्रचार और प्रसार कर रही है, जबकि यह सर्वविदित है कि दादा लेखराज का तो सन् 1969 में ही देहावसान हो चुका है। फिर भला वो सारे विश्व के पिता अर्थात् प्रजापिता ब्रह्मा कैसे कहला सकते हैं? दादा लेखराज के मुख के द्वारा सुनाई गई ज्ञान मुरलियों में निराकार परमात्मा शिव ने गीता एवं गीता ज्ञानदाता के संबंध में निम्नलिखित महावाक्य उच्चारे हैं :

  • यह है नई दुनिया के लिए नया ज्ञान। देने वाला एक ही बाप है। कृष्ण यह ज्ञान नहीं देता। कृष्ण को पतित-पावन नहीं कहा जाता। पतित-पावन तो एक ही परमापिता परमात्मा है, जो पुनर्जन्म रहित है और गीता में नाम डाल दिया है—कृष्ण का, जो पूरे 84 जन्म लेते हैं।        (मु.28.10.87 पृ.2 आ.)
  • श्रीकृष्ण को वृक्षपति नहीं कहेंगे। परमपिता परमात्मा ही मनुष्य सृष्टि का बीजरूप, क्रियेटर हैं। कृष्ण को क्रियेटर नहीं कहेंगे। वह तो सिर्फ दैवीगुण वाला मनुष्य है। (मु.22.2.88 पृ.1 म.)
  • कृष्ण तो सबका फादर नहीं है। (मु.30.9.98 पृ.2 आ.)
  • कृष्ण को सभी आत्माओं का बाप नहीं कहेंगे। आत्माओं का बाप परमपिता परमात्मा कहते हैं कि मामेकम् याद करो। (मु.13.9.88 पृ.3 अं.)

ब्रह्माकुमारी संस्था द्वारा प्रकाशित त्रिमूर्ति शिव के चित्र में दादा लेखराज को ब्रह्मा के रूप में चित्रित किया गया है, किंतु सन् 1969 में दादा लेखराज के निधन के पश्चात् कौन-सी मनुष्यात्माएँ शंकर तथा विष्णु की भूमिका अदा करेंगी, इसकी उन्हें जानकारी नहीं है, इसलिए शंकर तथा विष्णु के स्थान पर वही भक्तिमार्गीय चित्र दिखाए गए हैं। माउन्ट आबू से चलाई गई मुरलियों और अव्यक्तवाणियों के आधार पर आध्‍यात्मिक विद्यालय का मानना है कि सन् 1969 के बाद से निराकार परमात्मा शिव एक और साकार मनुष्य रथ शिव-शंकर भोलेनाथ के द्वारा सभी मनुष्यात्माओं को गीता का सच्चा ज्ञान दे रहे हैं तथा सहज राजयोग सिखा रहे हैं, जिससे हर अर्जुन रूपी आत्मा मनुष्य से देवता बन सके। इस बात के प्रमाण दादा लेखराज के द्वारा सुनाई गई अनेक ज्ञान मुरलियों में ही मौजूद हैं, जिन्हें ब्रह्माकुमारी संस्था के सरपरस्त, अपनी गद्दी खो जाने के डर से स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।

ब्रह्माकुमारी संस्था तथा आध्यात्मिक विद्यालय का मानना है कि दादा लेखराज की आत्मा ही आने वाले सतयुग में श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लेगी, किंतु ब्रह्माकुमारी संस्था द्वारा दादा लेखराज का गीता ज्ञानदाता शिव के माध्यम के रूप में प्रचार-प्रसार किया जाना, स्वयं उनके मुख द्वारा सुनाई गई ज्ञान मुरलियों को नकारने का कार्य है। दादा लेखराज तो केवल सन् 1951 से 1969 तक भगवान शिव के टेम्पररी मनुष्य रथ बने, जिस दौरान उन्होंने ब्रह्माकुमार-ब्रह्माकुमारियों को एक माँ का प्यार दिया और उनके द्वारा उच्चारे गए भगवान शिव के महावाक्य सच्ची गीता माता के रूप में ब्रह्माकुमार-कुमारियों के बीच प्रसिद्ध हुए, किंतु सन् 1951 से पहले तथा सन् 1969 में उनके निधन के पश्चात् इस बृहत ईश्वरीय कार्य का बीड़ा उनके पूर्व जन्म की भागीदार वाली आत्मा ने उठाया है, जो कि वर्तमान समय निराकार शिव के साकार माध्यम अर्थात् महादेव शिव-शंकर की भूमिका अदा कर रही है और भविष्य सतयुग में सत्यनारायण के रूप में अगले 1250 वर्ष बाद प्रारंभ होने वाले त्रेतायुग में श्री राम की भूमिका अदा करेगी।

भगवान शिव ने दादा लेखराज के द्वारा गीता का ज्ञान अर्थात् मुरली सुनाई ज़रूर थी, किंतु उसमें छिपे गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन अपने वर्तमान मनुष्य रथ के द्वारा कर रहे हैं। जैसे आम हिन्दुओं द्वारा अज्ञानवश भोलेनाथ शिव-शंकर के स्थान पर आकर्षक श्रीकृष्ण को गीता ज्ञानदाता मान लिया गया है, उसी प्रकार ब्रह्माकुमारी संस्था द्वारा अज्ञानवश साधारण शंकर या राम वाली आत्मा के स्थान पर आकर्षक शरीर वाले धनाढ्य दादा लेखराज अर्थात् कृष्ण वाली आत्मा को गीता ज्ञानदाता मान लिया गया है। ब्रह्माकुमारी संस्था द्वारा प्रकाशित ज्ञान मुरलियों में भी शिवबाबा से पहले दादा लेखराज (पिताश्री) का नाम डाल दिया गया है। यही वह एकज भूल है, जिसके कारण चतुर्युगी सृष्टि-चक्र में, द्वापरयुग से भक्तिमार्ग में संस्कृत की गीता के रचयिता के रूप में शिव-शंकर के स्थान पर श्री कृष्ण का नाम डाल दिया गया है। गीता में भगवान के लिए दी गई अव्यक्त, अजन्‍मा, अभोक्ता आदि की संज्ञाएँ वास्तव में शिव-शंकर पर हद और बेहद में लागू होती हैं, न कि श्रीकृष्ण पर।

  • बाप कहते हैं कि गीता का भगवान मैं हूँ। गीता माता रची शिवबाबा ने। जन्म लिया कृष्ण ने। उनके साथ राधे और सब आ जाते हैं। पहले हैं ही ब्राह्मण। बाप कहते हैं, कौन मूढ़मती हैं, हमारा नाम-निशान ही गुम कर दिया? फिर मुझे ही आकर बताना पड़ता है कि गीता का भगवान मैं शिव परमात्मा हूँ। मैंने गीता रची। गीता से कृष्ण बच्चा पैदा हुआ। तुमने फिर बाप के बदले बच्चे का नाम डाल दिया, यह है बड़ी भूल। (मु.13.12.88 पृ.2 अं.)
  • रुद्र से कृष्ण बच्चा पैदा हुआ, तो उसमें बाप के बदले बच्चे का नाम डाल दिया। (मु.29.3.88 पृ.1 अं.)
  • गीता है माई-बाप। गीता को माता कहा जाता है। और कोई पुस्तक को माता नहीं कहते। इनका नाम ही है—गीता माता। अच्छा, उनको किसने रचा? पहले-पहले पुरुष स्त्री को एडाप्ट करते हैं ना। (मु.28.9.88 पृ. आ.) (तो ज़रूर शिव भोलेनाथ ने यज्ञ के आदि में भी गीता के उपरान्त टाइटलधारी दादा लेखराज ब्रह्मा को ही 18 अध्यायी गीता माता के रूप में एडाप्ट किया)A
  • सारा मदार गीता को करेक्ट कराने पर है। गीता खण्डन होने कारण भगवान की हस्ती गुम हो गई है। (मु.9.3.88 पृ.2 म.)
  • एक ही श्रीमत भगवत गीता के भगवान से ही भारत को माखन मिलता है। श्रीमत भगवत गीता को भी खण्डन किया हुआ है, जो ज्ञानसागर पतित-पावन निराकार परमपिता परमात्मा के बदले श्रीकृष्ण का नाम डाल खण्डन कर छाछ बना दिया है। (मु.31.10.78 पृ.2 म.)
  • गीता तो है सभी शास्त्रों की मात-पिता। ऐसे नहीं कि सिर्फ भारत के शास्त्रों की मात-पिता है। नहीं। जो भी बड़े ते बड़े शास्त्र दुनिया में हैं, सभी की मात-पिता है। (मु.5.2.83 पृ.1 म.)
  • वह है स्वर्ग का रचयिता, सबका सहायक। …….. कृष्ण तो स्वयं रचना है। बगीचे का फर्स्टक्लास फूल है। (मु.5.2.83 पृ.1 म.)

यही वह एकज भूल है, जिसके कारण भारत देश की दुर्गति हुई है, गीता खण्डित हो गई है और सभी धर्मशास्त्रों की माता होने के बावजूद गीता को अन्य धर्मावलंबियों द्वारा स्वीकार नहीं किया जाता है। इसी कारण अलग-अलग विद्वानों द्वारा गीता की अलग-अलग व्याख्या की गई है। शंकराचार्य ने उसी गीता के आधार पर आत्मा और परमात्मा को एक (अद्वैत) सिद्ध किया, जबकि माध्वाचार्य ने आत्मा और परमात्मा को भिन्न (द्वैत) सिद्ध किया। गीता में काम विकार को महाशत्रु की संज्ञा दी गई है। दुनिया वाले इस बात को इसलिए स्वीकार नहीं करते; क्योंकि गीता के तथाकथित रचयिता श्री कृष्ण की आठ पत्नियाँ और 16,108 गोपियाँ शास्त्र में प्रसिद्ध हैं। यदि गीता ज्ञान दाता के रूप में महादेव शिव-शंकर का नाम आया होता तो संसार काम महाशत्रु वाली बात को सहज स्वीकार कर लेता; क्योंकि शंकर तो एक पत्निव्रता या कामदेव को भस्म करने वाले के रूप में प्रसिद्ध है। शास्त्रों का ही उदाहरण लें, तो जिस प्रकार सत्यनारायण की कथा में साधारण, बूढ़े मानव के रूप में आए भगवान को पहचाना नहीं जाता, उसी प्रकार शंकर के श्मशानवासी साधारण रूप को देखकर उनके ससुर दक्ष प्रजापति ने उन्हें नहीं पहचाना और उनका अपमान किया। तो यथा राजा तथा प्रजा।

भारत में गीता की मान्यता माता के रूप में भी है, किंतु भगवान शिव द्वारा वर्तमान समय दिए जा रहे ईश्वरीय ज्ञान में इस बात का भी स्पष्टीकरण दिया गया है कि गीता केवल ज्ञान का प्रतीक पुस्तक ही नहीं, अपितु एक चैतन्य मनुष्यात्मा का भी प्रतीक है, जो कि वर्तमान संगमयुग में ईश्वरीय परिवार की पालना करने के लिए प्रजापिता के साथ जगदंबा की भूमिका अदा कर रही है। इन्हें ही हिन्‍दू धर्म में आदिदेव-आदिदेवी, मुसलमानों में आदम-हव्वा, ईसाइयों में ऐडम-ईव तथा जैनियों में आदिनाथ-आदिनाथिनी के रूप में जाना जाता है।

अत: उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखते हुए यदि बालक श्रीकृष्ण (दादा लेखराज) के स्थान पर पिता शिव-शंकर को गीता ज्ञानदाता के रूप में प्रस्तुत किया जाए, तो गीता को सारे विश्व की आत्माओं के द्वारा भगवान की वाणी के रूप में सहज स्वीकार कर लिया जाएगा।

भगवान ने गीता कब सुनाई? ज़रूर सभी धर्म होने चाहिए। सभी धर्मों के लिए वास्तव में एक गीता है मुख्य। सब धर्म वालों को मानना चाहिए। ….. सभी धर्मों की गीता द्वारा सद्गति करने बाप आया हुआ है। गीता बाप की उच्चारी हुई है। उसमें बाप के बदले बच्चे का नाम डाल मुश्किलात कर दी है।  (मु.21.2.93 पृ.1 मध्‍यांत)

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Bombs of the Divine Knowledge

22 जून

Do you still think that Shiva and Shankar are the same?


It is outdated!

Hurry up and discover the real sound of Shankar’s damru already discovered by … !

Based on the Shrimat Bhagavad Gita of the Confluence Age  published in the Indian educational market, it has been discovered that Shiva and Shankar are two separate beings. Indian people have  made  a great mistake considering them as the same.

‘Shankar says, “My role is to cause destruction”. I also inspire the elements to cause earthquake, torrential rains… ‘ [Sakar Murli 7-4-73]

Do you want to know more?  Write or call

trimurtishiva3 @gmail.com

+48 603 257 652

Adhyatmik Ishwariya Vishwa Vidyalaya

Delhi 110085,  A/1, 351-352, Vijay Vihar Ritthala, India Tel: + 91 11 27044227

kailashproject4.wordpress.com

महा नाटक

10 अप्रैल

जैसे कोई ड्रामा है, वैसे ही यह भी ड्रामा है, लेकिन वे हद के ड्रामा होते हैं और यह तुम्हारा ५००० वर्षों का बेहद का ड्रामा है|” [शिवबाबा]

सन १९३६-३७, शुरू में कलकत्ता फिर सिंध हैदराबाद में एक आध्यात्मिक विद्यालय सूक्ष्म रूप से निकला जो आज आध्यात्मिक ईश्वरीय विश्वविद्यालय कहा जाता है|  इस विद्यालय में ज्ञान में आधुनिक लोगों के प्रति महत्वपूर्ण बातें सरल और निश्चित रूप से स्पष्टीकरण की जाती हैं – जैसे मनुष्य का स्वभाव, उसका भगवान से सम्बन्ध, सृष्टि का आदि-माध्यम-अंत, विभिन धर्मों की उत्त्पति, धार्मिक शास्त्रों का सार आदि | जिनको यह ज्ञान मिला, उन लोगों में से कुछ ही लोग ऐसे नहीं हैं जो प्रभावित नहीं हो पाए | इस ज्ञान की वजह से कुछ लोग अपने जीवन में अमूल्य मोड़ का अबुभाव करते हैं, कुछ इस ज्ञान को साधारण तर्क से विपरीत समझते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जो तथ्य तथा शास्त्र को लेकर इसको सच्चा या झूठा साबित करने की कोशीश करते हैं | फिर भी एक विषय में इन सबकी सहमति है कि यह ज्ञान नया है | यह मनुष्य को नया दृष्टिकोण प्रदान करता है, धार्मिक बातों में नया परिप्रेक्ष को लाता है, अलग-अलग धर्मों में लड़ाइयों को अर्थहीन साबित कर देता है | जिनको लेकर कई धर्म आपस में विवाद करते रहते हैं, वेही इस ज्ञान का दाता हैं | वे परंपिता शिव हैं जिन्होंने हर कल्प चक्र मुआफिक सन १९३६ में कलकत्ते में मनुष्य आत्माओं के पिता के तन में प्रवेश किया | आज तक शिवबाबा मनुष्यों को अपना ज्ञान देते रहते हैं जिसमें सृष्टि का इतिहास सुनाते हैं, इस मनुष्य नाटक का परिदृश्य (सिनेरीओ) जिसमें सभी को चाहते या न चाहते हुए भी शाश्वत रूप से भाग लेना ही है |

सृष्टि चक्र
“ऐक्यरट बना-बनाया ड्रामा है | यह सृष्टि भी चार भागों में बनती हुई है, इसमें एक सेकेण्ड भी कम ज्यादा नहीं हो सकता |” [शिवबाबा]

सृष्टि चक्र अर्थात सृष्टि के इतिहास के ५००० साल हैं | यह एक प्रकार का नाटक है जिसका परिदृश्य  हर ५००० सालों में चक्कर लगाता रहता है | इस चक्कर का न आदि न अंत है | यह बड़ा नाटक निर्दिष्ट, अचूक (ऐक्यरट), उचित और सभी के लिए कल्याणकारी है | निर्दिष्ट अर्थात उसका हर एक ब्यौरा (डिटैल ) हर चक्र में अपने-अपने समय पर दोहराता है | मनुष्य जिनका जन्म हुआ है उनका जन्म फिर से अगले चक्र में बिलकुल वैसी ही परिस्थितियों में होगा, सुख जिसका अनुभाव हुआ है फिर दोहराएगा, युद्ध जो किये हुए हैं फिर से होंगे और जो अभी बैटकर ये शब्द पढ़ रहा है वह अगले चक्र के इसी समय में ठीक यही कार्य कर रहा होगा | अचूक अर्थात नाटक का हर दृश्य सही जगह पर है | बाह्य से अव्यवस्थित प्रतीत होते हुए भी सम्पूर्ण व्यवस्था में है और कुछ भी बिना कारण के अपने समय से पहले, विलम्ब से  या व्यर्थ ही नहीं हो सकता | सब कुछ तब होता है, जब वह होना है, भले ही भिन्न-भिन्न आत्मारूपी अभिनेताओं को कुछ अलग लगता होगा | उचित अर्थात इस नाटक का हर आत्मारूपी अभिनेता सुख का और दुःख का अनुभाव करता है | हर किसी के अनुभाव अपनी क्षमते के मुताबिक होते हैं | कल्याणकारी अर्थात जो कुछ भी नाटक में होता है वह लाभदायक है, उसका अनुकूल (फेवरबल) अंत होता है और हर एक को वही मिलता है जिसके लिए वह व्यवहारिक रूप से पुरुषार्थ करता है |

नाटक का परिदृश्य
बेहद के नाटक के चार अंक होते हैं जिनकी अवधी समान है | पहला अंक सतयुग (सत्य का युग) या स्वर्णिम युग कहलाया जाता है  जो आत्मा और प्रकृति की भी सतोप्रधान अवस्था है | उस समय केवल कुछ अभिनेता नाटक में हैं और भारत के एक अविनाशी भाग के समान है | उसके बाद दूसरा अंक आता है जो सतोसामान्य पवित्रता का समय है | उसे त्रेतायुग कहते हैं | आबादी की  वृद्धि के कारण नाटक में और थोड़े अभिनेता आ जाते हैं | क्रमशः तीसरा अंक आता है जब आत्माएं और प्रकृति सिर्फ अर्धांश पवित्र (राजोप्रधान) रहती हैं | वह समय जो द्वापरयुग कहलाया जाता है विभिन्नता की शुरुआत होती है | तब नए-नए धर्म निकलने लगते हैं, आबादी और तेज़ी से बढ़ जाती है और ज़मीन की वृद्धि भी होती है | अंतिम अंक अपवित्रता और पतन का समय है, यानि कलियुग | युद्ध, अतिजान्संख्या, बार-बार आनेवाली विपदाएँ, बढती हुई बीमारियाँ, बढ़ता हुए प्रदूषण – उस समय की विशेषताएँ हैं|

चक्र के पहले २५०० साल हर विषय में एकता का समय होता है – धर्म, राज्य, भाषा, मत आदि में | आत्माओं को यह याद है की वे शरीरों से अलग हैं – आत्माभिमानी हैं |  वे दैवी गुणों से भरपूर हैं, प्रकृति पर नियंत्रण करती हैं और स्थायी सुख शान्ति का अनुभाव करती हैं | शास्त्रों में वह समय स्वर्ग या राम राज्य कहलाया जाता है | फिर अगले  २५०० साल बढती हुई विभिन्नता का समय है, जिसमें आत्माएं विकारी बनकर अपने को देह समझने के कारण प्रकृति पर नियंत्रण खो देती हैं | भ्रष्ट मतों, विचारों, धार्मिक संस्थाओं, सम्प्रदायों की संख्या  बढ़ जाती है जिससे दुःख अशांति का अनुभाव ज्यादा हो जाता है | उस समय को नरक या रावण राज्य कहते हैं | स्वर्ग और नरक इस सृष्टि के ही दो पहलू होते हैं किसी आकाश या पातळ में नहीं |

हर चक्र के नाटक का परिदृश्य समान होता है | इसमें विकास (एवलूशन) जैसी बात नहीं लेकिन बार-बार दोहरानेवाला, निरंतर आत्माओं तथा प्रकृति का पतन जो चक्कर में समय के अनुसार और तेज़ी से होता है | अंतिम दृश्य में महाविनाश होता है जो चक्र के अंत में एक ही तरह से होता है | तभी तमोप्रधान आत्माएं और प्रकृति फिर से अपनी सतोप्रधान स्थिति में लौटायी जाती है और खेल फिर से शुरू होता है |

अभिनेता और नाटक का द्रिध्य (सीनरी)
चेतन्य मनुष्य आत्माएं तथा दुसरे प्राणियों की आत्माएं इस नाटक के अभिनेता हैं जिसका दृश्य प्रकृति के ५ अचेतन्य  तत्त्वों से बनी हुई है | उसका रंग-मंच पृथ्वी है जो चारों तरफ साकार सृष्टि के अन्तरिक्ष से घेरी हुई है जिसके बाहर रूहानी स्थान अर्थात परमधाम है | परमधाम ऐसा स्थान है जिसमें आत्माएं बिना किसी अनुभाव के अक्रिय अवस्था में रहती हैं | वे क्रमशः परिदृश्य में अपनी-अपनी निर्दिष्ट भूमिकाएं पृथ्वी पर निभाने के लिए साकार सृष्टि में आती रहती हैं | यहाँ उनको साकार शरीररूपी वस्त्र मिलते हैं जो अनुभाव पाने के लिए और कर्म करने के लिए अनिवार्य हैं | आत्मारूपी अभिनेता कुछ नियमों के अधीन हैं जैसे जन्म-मरण का चक्र, चार अवस्थाओं से गुज़रना, कर्मभोग आदि | एक चक्र में उनको ज्यादा से ज्यादा ८४ जन्म, कम से कम १ जन्म मिलता है अर्थात हर आत्मारूपी अभिनेता को कम से कम एक जन्म के लिए इस खेल में भाग लेना ही पड़ता है | जो आत्मा इस रंग-मंच पर पहली बार आती है, उसको नाटक के अंत तक यहीं रहना पड़ता है अर्थात भले ही अभिनेता क्रमशः आत्माओं की श्रेणी में अपने-अपने नम्बर के अनुसार आते हैं, तो भी सभी को एक साथ नाटक के अंतिम समय में रंग-मंच को छोड़ना होता है | किसी आत्मा की भूमिका ज़्यादा लम्बी और किसी की बहुत छोटी होती हैं | यह व्यक्तिगत (इन्डविजवल) जन्मों की संख्या और उनकी अवस्था पर निर्भर होता है जो भी हर आत्मारूपी अभिनेता के लिए निश्चित है | मनुष्य आत्माओं की श्रेणी में पहली आत्मा अर्थात साकार मनुष्य पिता की भूमिका सब से लम्बी है | वे कभी इस रंग-मंच को नहीं छोड़ते | वे हर चक्र के शुरू से अंत तक इस साकार सृष्टी में रहते हैं | क्रमानुसार , श्रेणी में अंतिम आत्मा की भूमिका सब से छोटी होती है – वह तुरंत परमधाम में वापस जाने के लिए साकार सृष्टि में  आती है | जो आत्मा पहले रंग-मंच पर प्रत्यक्ष होती है, वह बाद में आनेवाली आत्मा से ज्यादा शक्तिशाली होती है | भले ही आत्मा कलियुग के अंत में आती है, फिर भी अपनी भूमिका को सतोप्रधान अवस्था में निभाने लगती है और तमोप्रधान अवस्था में समाप्त करती है | नाटक के चौथे अंक में चल रहा है, तो भी नयी आनेवाली आत्माएं सतिप्रधान अवस्था में आकर शुरू में केवल श्रेष्ट भूमिका निभाती है और सुख ही सुख का अनुभाव करती हैं |

नाटक की शूटिंग
आत्मारूपी अभिनेता और प्रकृति इस नाटक में भाग लेनेवाली दो विनाशी शक्तियां हैं अतः नाटक भी अविनाशी होना चाहिए | नाटक कभी किसी के द्वारा नहीं रचा गया है, परन्तु इसमें एक प्रकार की शूटिंग का समय निश्चित होता है | वह नाटक का अंतिम १०० साल हैं जो कलियुग और सत्युग के बीच परिवर्तन का समय है जिसको संगमयुग कहते हैं | तब निर्देशक भी रंग-मंच पर मौजूद होता है | उन १०० सालों में सब आत्माएं फिर से अपनी-अपनी भूमिकाओं (सद्गुण, अवगुण, सम्बन्ध-संपर्क आदि) से पूरित होती हैं | उन १०० सालों में जिनमें नाटक के चार युगों का सार समाया हुआ है आत्माओं में सूक्ष्म रूप में हर धर्म, राज्य, परंपरा, संस्कृति, मत, शास्त्र, रीति-रिवाज आदि अर्थात सब कुछ जिसका चार युगों के दौरान अनुभाव होता है उसका रिकॉर्ड होता है | संगम युग जो पूरे नाटक की अपेक्षा बहुत छोटा है, आत्मारूपी अभिनेताओं के लिए सच्चा ज्ञान प्राप्त करने का भी समय है | तभी उनको मालूम पड़ता है की उनका असली रूप क्या है, वे कहाँ हैं, कहाँ से आते हैं, क्या कर रहे हैं आदि | वे सृष्टि का असली इतिहास और भूगोल, अपने-अपने जन्मों की कहानी, मुख्या हीरो-हेरोइने (राम और कृष्ण) को पहेचान सकते हैं और निर्देशक से भी मिल सकते हैं | संगम युग हिंसक बदलावों, तीव्र परिवर्तन, आत्माओं और प्रकृति का शोधन (प्युरफकैशन), तमोप्रधान पद्धतियों का विनाश और सतोप्रधान अवस्था में वापसी का समय होता है | अंत में ही पर्दे के पीछे से  स्वयं निर्देशक निकलता है |

नाटक का निर्देशक
जब निर्देशक – परंपिता शिव रंग-मंच पर आते हैं तब संगम्युग अर्थात ५००० वर्षों के नाटक की पुनरावर्ती रेकोर्ड शुरू होता है | निर्देशक सब आत्माओं का पिता हैं, जो एक ही पूरे नाटक को परिपूर्ण रूप से जानते  हैं | हर दृश्य, हर आत्मारूपी अभिनेता के बारे में पूरा ज्ञान होने के कारण वेही उनको सही ज्ञान दे सकते हैं और हर कल्प के चक्र में हूबहू ऐसा करता है | ज्ञान मिलने तक मनुष्य आत्माएं अपनी-अपनी भूमिकाओं से अनभिज्ञ होने के कारण बुद्धिहीन अवस्था में हैं |

निर्देशक अद्वितीय आत्मा है जिसका न अपना शरीररूपी वस्त्र है, न वे  उन नियमों के अधीन हैं जो बाकी सब आत्माओं के लिए अनिवार्य हैं | लगभग ५००० साल वे परमधाम में रहते हैं और भले ही वे संगमयुग में पृथ्वी पर मौजूद हैं तो भी अधिकांश समय तक गुप्त रूप में रहते हैं | नाटक के परिदृश्य में उसके लिए असाधारण भूमिका और कार्य नूँध होते हैं | निर्देशक अपनी भूमिकाओं को निभाने के लिए और कार्यों को पूरे करने के लिए इस नाटक के हीरो और हिरोइन के तन को काम में लाते हैं | अर्थात वे मनुष्य आत्माओं के तन में प्रवेश करते हैं | हीरो – राम का शरीर उनके लिए मुक़र्रर रथरूपी वस्त्र है | हेरोइन – कृष्ण का तन अल्पकाल का वस्त्र है | सन १९३६ से परंपिता  शिव निर्देशक  जैसे नाटक की शूटिंग का प्रबंध (मैनिज) और निरिक्षण (सूपर्वाइज़) करते हैं | साथ ही क्रमशः वे अपनी भूमिकाएँ निभाते हैं – माता की पार्ट कृष्ण के तन से; बाप, शिक्षक, सदगुरु की पार्ट – राम के तन से | वे आत्माओं को पतित से पावन बनाने के साथ ज्ञान, प्यार, आत्मिक पालन, स्थायी सुख शांति रूपी वरासत देते हैं तथा उनको मुक्ति और जीवन मुक्ति की ओर मार्ग दिखाते हैं | वे १०० सालों में तीन कार्य भी पूरे करते हैं – ब्रह्मा के रूप से नयी सृष्टि की स्थापना, शंकर के रूप से पुरानी, तमोप्रधान सृष्टि का विनाश, विष्णु के रूप से नयी, पवित्र सृष्टि का पालना | हर मनुष्य आत्मारूपी अभिनेता परंपिता शिव से मिले हुए ज्ञान और उनके कार्य अलग-अलग रूप से आत्मिक रजिस्टर में याद रखता है | नए कल्प के चक्र के दूसरे अर्धांश से लेकर वे रजिस्टर चित्रों, शास्त्रों, मूर्तियों, पूजाओं, धार्मिक अनुष्ठानों आदि के रूप में प्रत्यक्ष होते हैं अर्थात वे सब परंपिता शिव के इस छोटे संगम युग में भूमिकाओं और कर्मों की यादगार हैं |  जो रीति-रिवाज हम आज देखते हैं, वे सब पहले चक्र के संगमयुग की यादगार हैं |

यह सदा दोहरानेवाला इतिहास का सार है जिसका एक ही  सिनेरीओ होता है | वास्तव में उसका न आदि न अंत होता है या दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि उसका आदि और अंत सर्कल में एक ही बिंदु है | लगभग ५००० सालों के अन्दर उस नाटक के अभिनेता अपने-अपने कर्मों से अनभिज्ञ होते हुए अपनी-अपनी भूमिकाएँ निभाते हैं | अधिकांश समय तक उनको यह भी मालुम नहीं हो पाटा कि वे नाटक के पात्र हैं यथार्थतः उनको इस खेल में भाग लेना ही होगा जिसमें उनको चार अवस्थाओं से गुज़रकर तमोप्रधान तक जाना ही होगा | वे यह भी नहीं जानते कि वे अपनी-अपनी भूमिकाएं पहले ही निभाते थे तथा भविष्य में वे फिर से उन्हें निभाते रहेंगे |

एन्त्रोपी (उत्क्रम माप ) जो वैज्ञानिक लोग प्राकृतिक प्रक्रियाओं की विशेषता मानते हैं इस नाटक में हर बात के लिए लागू होता है, चाहे भौतिक चाहे आत्मिक स्तर पर | यह चक्र में सतोप्रधान से तमोप्रधान बन्ने के लिए अनुरूप होता है | जब आत्माएं प्रकृति के संपर्क में आती रहती हैं उनकी शक्ति क्षीण हो जाती है | उस प्रक्रिया  में वे पहले प्रकृति से अलगाव का अनुभाव खो देती हैं और समय के अनुसार प्रकृति पर किसी रूप में नियंत्रण नहीं कर सकतीं | दूसरी ओर प्रकृति अर्थात पांच तत्त्व इस्तेमाल में होने के कारण ज्यादा से ज्यादा ऐसे रूपों में बदल जाते रहेत हैं जिनका प्रयोग नहीं हो सकता | जैसे एक बार प्रयोगित गतिज ऊर्जा  यांत्रिक कार्यों के लिए प्रयोग नहीं किये जा सकते | दूसरे शब्दों में कल्प चक्र की परिक्रमा के साथ प्रदूषण बढ़ जाता है | आत्माओं का प्रदूषण प्रकृति की स्थिति में प्रतिबिम्बित होता है और प्रकृति का प्रदूषण आत्माओं की स्थिति पर बुरा असर डालता है |  प्रदूषण की बढ़ोत्तरी के साथ जीवन के अनुभाव बिगड़ जाते हैं जो जीवन हर क्षेत्र में प्रत्यक्ष हो जाता है, चाहे एक व्यक्ति, चाहे समूह, चाहे समाज या सारी दुनिया  की आबादी के दृष्टिकोण से देखा जाये | हर चीज़, हर सम्बन्ध, हर संगठन या संस्था इस नियम की अधीन होती है | “सब कुछ नया सुखदायी, सब कुछ पुराना दुखदायी होता है |” बढती हुई अव्यवस्था, संघर्ष, विभाजन, विविधता, भूक, अभाव, बीमारियाँ, विपत्तियाँ आदो आत्मिक और भौतिक चक्रीय प्रदूषण की निशानियाँ हैं | आत्माओं में पांच विकार मौजूद हैं और पांच तत्त्व विनाशकारी बनते हैं |

“हर एक मनुष्य मात्र को, हर चीज़ को सतो, रजो, तमो में आना होता है. […] नए को पवित्र, पुराने को अपवित्र कहेंगे.|” [शिवबाबा]

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