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गीता की पुत्री बाइबल

3 अगस्त

आम जानकारी के अनुसार बाइबल का अर्थ है जुडाइज़्म और ईसाई धर्म के लिए महत्वपूर्ण दो धार्मिक ग्रंथ जिनका आपस में गहरा संबंध है, में से एक। बाइबल का नाम सुनते ही दुनियावालों के मन में किसी ग्रंथ की छवि उभरती है। ईसाइयों के लिए यह परम ग्रंथ है।

तथापि, परमपिता शिव द्वारा सुनाया जा रहा नया ज्ञान बाइबल की आम जानकारी पर एक पूर्णतया नया प्रकाश डालता है। सबसे पहले हमें गीता के विषय में कुछ तथ्यों को याद करना होगा। परमपिता यह पढ़ाते हैं कि गीता माता है और गीता एक ग्रंथ है। दोनों मामलों में गीता परमपिता शिव की रचना है। इसीलिए गीता, माता के साथ-साथ एक ग्रंथ के रूप में सर्वोत्तम है। बाकी सभी ग्रंथ – बाइबल, धम्मपद, कुरान, इत्यादि उसकी संतान हैं। जो कुछ भी माता का हाल होगा वही बच्चों का भी हाल होगा। यह समझना तब आसान हो जायेगा जब हम अनादि सृष्टि चक्र की बात को समझेंगे जिसमें जीवात्माएं पांच तत्वों के द्वारा या उनकी मदद से अपनी भूमिका अदा करती हैं और जिसमें कोई भी बात पहले सूक्ष्म रूप में और फिर स्थूल रूप में होती है। जब तक हम यह बात नहीं समझेंगे हम पांच तत्वों की अधीनता से कभी भी मुक्त नहीं हो पायेंगे और हमारी अवधारणा सदैव सीमित रहेगी। परमपिता याद दिलाते हैं कि गीता में गंभीर रूप से अपमिश्रण किया गया और गीता ज्ञानदाता के नाम की जगह कृष्ण का नाम डाल दिया गया, जो कि वास्तव में गीता ज्ञानदाता की पाठशाला में एक विद्यार्थी था। यही अपमिश्रण सभी शास्त्रों में भी होता आया है। वे विस्तारपूर्वक समझाते हैं कि यह कैसे होता है और इसके लिए कौन जिम्मेदार है। ब्रह्माकुमारियों ने परमपिता द्वारा सुनाये गए ज्ञान में मिलावट और हेर-फेर की है, इसमें कृष्ण अर्थात् दादा लेखराज (ब्रह्मा बाबा) का नाम डाल दिया है और इसे विनाश के एक साधन के रूप में बदल दिया है। इसके कई प्रमाण हैं।

अब यह बाइबल से किस प्रकार संबंधित है? ब्राह्मण परिवार (अर्थात् वह आध्यात्मिक परिवार जो भगवान इस संगमयुग में आकर स्थापित करते हैं) में एक चैतन्य मनुष्यात्मा है जो चैतन्य बाइबल की भूमिका अदा करती है। अर्थात्, जिस प्रकार चैतन्य गीता की भूमिका अदा करने वाली चैतन्य मनुष्य आत्मा परमपिता द्वारा सुनाये जा रहे ज्ञान का भंडार बन जाती है, उसी प्रकार चैतन्य गीता की भूमिका अदा करने वाली आत्मा भी उस ज्ञान का भंडार बन जाती है, किंतु उससे कम सीमा तक। अब संगमयुग में वह आत्मा (उक्त ब्राह्मण परिवार में) ईसाई धर्म के संस्कारों वाली आत्माओं की प्रत्यक्ष माता की भूमिका अदा करती है। वर्तमान समय दिये जा रहे ईश्वरीय ज्ञान को समझने की उसकी क्षमता (उक्त ब्राह्मण परिवार में) क्रिश्चियन समूह में सबसे अधिक होती है और वह उस स्तर को तय करती है जिस स्तर तक ईसाई लोग ज्ञान को समझ पाते हैं।

अतः यदि ईसाई लोग सच्चे बाइबल को समझना चाहते हैं तो उन्हें उस आत्मा को पहचानने का प्रयास करना चाहिए। ईसाईयों के लिए प्रत्यक्ष माता की भूमिका अदा करने वाली उस आत्मा के साथ-साथ एक आत्मा होगी जो उनके लिए पिता की प्रत्यक्ष भूमिका अदा करेगी। ये दोनों ईसाई धर्म के बीज हैं। अतः, वे सभी ईसाई जो अपने बारे में, बाईबल के बारे में सच्चाई को जानना चाहते हैं तो उन्हें ब्राह्मण परिवार के भीतर अपने समूह की मुख्य आत्माओं को पहचानना चाहिए। उन्हें पहचानने के लिए उन्हें पहले परमपिता द्वारा सुनाये जा रहे ज्ञान को समझने, अपने आपको और उस परमपिता को पहचानने की जरूरत है। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक बाइबल नामक जड़ ग्रंथ को पढ़ने से कोई लाभ नहीं। इससे हम कहीं नहीं पहुँच सकते हैं। यह कल्पना के आधार पर चर्चा मात्र करवा सकती है। यह समय, धन और ऊर्जा की बरबादी है। इसके अलावा, यदि वे जीसस और क्राइस्ट, तथा पिता ईश्वर के साथ उनके संबंध के बारे में सच्चाई जानना चाहते हैं, और उनसे मिलना चाहते हैं तो उन्हें परमपिता के ज्ञान का अध्ययन करना चाहिए।

ईसा मसीह ने अपने अनुयायियों को कहा था कि वह अंत में अपने पिता के साथ वापस आ जायेंगे। उनके अनुयायियों ने उसका उल्लेख बाइबल में किया था। शायद सभी ईसाई यह समझते हैं कि एक दिन चमत्कार होगा और ईसा मसीह अपनी मज़ार से उन सब लोगों के साथ उभरेंगे जो आज तक मर चुके हैं। यही जेहोवा के गवाह आधिकारिक रूप से पढ़ाते हैं। परमपिता द्वारा सुनाये जा रहे ज्ञान के आलोक में यह अनुमान पूर्णतया गलत है और अज्ञानता के कारण है। अंतिम समय अब चल रहा है। मनुष्यात्मायें, सृष्टि चक्र में कई जन्मों का चक्कर काट कर अपनी यात्रा के अंतिम पडाव में हैं। यही बात जीसस और क्राइस्ट की भूमिका अदा करने वाली आत्माओं पर भी लागू होती है। मनुष्य ड्रामा में जीसस की भूमिका अदा करने वाली चैतन्य आत्मा को कई वर्षों पहले पहचान लिया गया था, किंतु ईसाईयों ने इस तथ्य की उपेक्षा की। उनके पोप जॉन पॉल द्वितीय ने पूर्ण अज्ञानता में अपना शरीर त्याग दिया, हालांकि उन्हें एक आधिकारिक पत्र द्वारा इस बात की सूचना दे दी गई थी। अब, क्राइस्ट की आत्मा जल्द ही प्रत्यक्ष होने वाली है। क्या वर्तमान पोप भी इसकी उपेक्षा करेंगे? अंत समय आने वाला है। इब्राहिम से लेकर सभी मानव धर्मों के पिता इस व्यापक मंच पर प्रत्यक्ष होने वाले हैं। क्या ईसाई लोग संगम के इस मनोहर समय को खोना चाहते हैं?

अपने वर्तमान रूप में बाइबल में कई तरह की मिलावट है। कई व्याख्याएं, कई अनुवाद कई प्रतियां इसे पूरी तरह गलत बना देते हैं। जीसस के शरीर से क्राइस्ट ने अपने शिष्यों को मौखिक रूप से पढ़ाया। कई वर्षों पश्चात उनके शिष्यों ने शास्त्र लिखना आरंभ कर दिया। लिखते समय ही उन्होंने शुरूआती मिलावट करना आरंभ कर दिया। इसके अलावा, क्राइस्ट ही सभी ईसाईयों के लिए प्रत्यक्ष धर्मपिता हैं। यदि ईसाई ये सोचते हैं कि वे पिता के स्पष्टीकरण के बिना यह जान सकते हैं कि उनके पिता क्या कहना चाहते थे तो यह गलत है। क्या एक बच्चा अपने पिता के स्थान पर बैठकर बिल्कुल उनके जैसी भूमिका अदा कर सकता है? यदि ऐसा संभव होता तो ईसाई लोग आपस में लड़ते-झगड़ते नहीं, क्योंकि उनके धर्मपिता क्राइस्ट शांति के दूत थे। इतिहास बताता है कि मुसलमानों के साथ-साथ ईसाईयों ने संपूर्ण विश्व में सबसे ज़्यादा खून-खराबा किया है। वे दूसरों का दमन करते रहे हैं और उन्हें गुलाम बनाते रहे हैं। उनके धर्मपिता क्राइस्ट ने यह नहीं सिखाया था। हिंसा के सबसे क्रूर रूपों में से एक – साम्यवाद का जन्म भी क्रिश्चियंस के बीच में ही हुआ था। उस व्यवस्था ने ईश्वर और क्राइस्ट के अस्तित्व को ही नकारने का दुस्साहस किया। ईसाइयों ने झूठा इतिहास गढ़ने का प्रयास किया और विश्व को यह समझाने की कोशिश की कि यूरोप ही सच्ची मानव सभ्यता का उद्गम स्थान है। इसकी शूटिंग (रिहर्सल) ब्रह्माकुमारियों में पहले ही हो चुकी है। उन्होंने दादा लेखराज को भगवान सिद्ध करने के लिए उनकी जन्मतिथि बदलकर झूठा इतिहास रचने का प्रयास किया। मध्य पूर्वी यूरोप के किसी शोधकर्ता ने इस बात को अच्छी तरह समझाया है।

परमपिता शिव से प्राप्त ज्ञान हमें इन सभी प्रक्रियाओं को समझने और इस बात का कारण जानने में मदद करता है कि क्रिश्चियन्स किस प्रकार कृष्ण अर्थात् ब्रह्मा बाबा (दादा लेखराज) और उनकी ब्रह्माकुमारी संस्था के अनुयायी मात्र हैं। ये सारी घटनायें पहले ही ब्रह्माकुमारियों द्वारा घटित हो चुकी हैं। इनकी शूटिंग (अर्थात् रिकार्डिंग) हो चुकी है। ईसाई धर्म से संबंधित आत्माएं अपने आपको प्रत्यक्ष कर चुकी हैं और यही सब बातें हर कल्प में दोहराई जायेंगी।

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