महा नाटक

10 अप्रैल

जैसे कोई ड्रामा है, वैसे ही यह भी ड्रामा है, लेकिन वे हद के ड्रामा होते हैं और यह तुम्हारा ५००० वर्षों का बेहद का ड्रामा है|” [शिवबाबा]

सन १९३६-३७, शुरू में कलकत्ता फिर सिंध हैदराबाद में एक आध्यात्मिक विद्यालय सूक्ष्म रूप से निकला जो आज आध्यात्मिक ईश्वरीय विश्वविद्यालय कहा जाता है|  इस विद्यालय में ज्ञान में आधुनिक लोगों के प्रति महत्वपूर्ण बातें सरल और निश्चित रूप से स्पष्टीकरण की जाती हैं – जैसे मनुष्य का स्वभाव, उसका भगवान से सम्बन्ध, सृष्टि का आदि-माध्यम-अंत, विभिन धर्मों की उत्त्पति, धार्मिक शास्त्रों का सार आदि | जिनको यह ज्ञान मिला, उन लोगों में से कुछ ही लोग ऐसे नहीं हैं जो प्रभावित नहीं हो पाए | इस ज्ञान की वजह से कुछ लोग अपने जीवन में अमूल्य मोड़ का अबुभाव करते हैं, कुछ इस ज्ञान को साधारण तर्क से विपरीत समझते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जो तथ्य तथा शास्त्र को लेकर इसको सच्चा या झूठा साबित करने की कोशीश करते हैं | फिर भी एक विषय में इन सबकी सहमति है कि यह ज्ञान नया है | यह मनुष्य को नया दृष्टिकोण प्रदान करता है, धार्मिक बातों में नया परिप्रेक्ष को लाता है, अलग-अलग धर्मों में लड़ाइयों को अर्थहीन साबित कर देता है | जिनको लेकर कई धर्म आपस में विवाद करते रहते हैं, वेही इस ज्ञान का दाता हैं | वे परंपिता शिव हैं जिन्होंने हर कल्प चक्र मुआफिक सन १९३६ में कलकत्ते में मनुष्य आत्माओं के पिता के तन में प्रवेश किया | आज तक शिवबाबा मनुष्यों को अपना ज्ञान देते रहते हैं जिसमें सृष्टि का इतिहास सुनाते हैं, इस मनुष्य नाटक का परिदृश्य (सिनेरीओ) जिसमें सभी को चाहते या न चाहते हुए भी शाश्वत रूप से भाग लेना ही है |

सृष्टि चक्र
“ऐक्यरट बना-बनाया ड्रामा है | यह सृष्टि भी चार भागों में बनती हुई है, इसमें एक सेकेण्ड भी कम ज्यादा नहीं हो सकता |” [शिवबाबा]

सृष्टि चक्र अर्थात सृष्टि के इतिहास के ५००० साल हैं | यह एक प्रकार का नाटक है जिसका परिदृश्य  हर ५००० सालों में चक्कर लगाता रहता है | इस चक्कर का न आदि न अंत है | यह बड़ा नाटक निर्दिष्ट, अचूक (ऐक्यरट), उचित और सभी के लिए कल्याणकारी है | निर्दिष्ट अर्थात उसका हर एक ब्यौरा (डिटैल ) हर चक्र में अपने-अपने समय पर दोहराता है | मनुष्य जिनका जन्म हुआ है उनका जन्म फिर से अगले चक्र में बिलकुल वैसी ही परिस्थितियों में होगा, सुख जिसका अनुभाव हुआ है फिर दोहराएगा, युद्ध जो किये हुए हैं फिर से होंगे और जो अभी बैटकर ये शब्द पढ़ रहा है वह अगले चक्र के इसी समय में ठीक यही कार्य कर रहा होगा | अचूक अर्थात नाटक का हर दृश्य सही जगह पर है | बाह्य से अव्यवस्थित प्रतीत होते हुए भी सम्पूर्ण व्यवस्था में है और कुछ भी बिना कारण के अपने समय से पहले, विलम्ब से  या व्यर्थ ही नहीं हो सकता | सब कुछ तब होता है, जब वह होना है, भले ही भिन्न-भिन्न आत्मारूपी अभिनेताओं को कुछ अलग लगता होगा | उचित अर्थात इस नाटक का हर आत्मारूपी अभिनेता सुख का और दुःख का अनुभाव करता है | हर किसी के अनुभाव अपनी क्षमते के मुताबिक होते हैं | कल्याणकारी अर्थात जो कुछ भी नाटक में होता है वह लाभदायक है, उसका अनुकूल (फेवरबल) अंत होता है और हर एक को वही मिलता है जिसके लिए वह व्यवहारिक रूप से पुरुषार्थ करता है |

नाटक का परिदृश्य
बेहद के नाटक के चार अंक होते हैं जिनकी अवधी समान है | पहला अंक सतयुग (सत्य का युग) या स्वर्णिम युग कहलाया जाता है  जो आत्मा और प्रकृति की भी सतोप्रधान अवस्था है | उस समय केवल कुछ अभिनेता नाटक में हैं और भारत के एक अविनाशी भाग के समान है | उसके बाद दूसरा अंक आता है जो सतोसामान्य पवित्रता का समय है | उसे त्रेतायुग कहते हैं | आबादी की  वृद्धि के कारण नाटक में और थोड़े अभिनेता आ जाते हैं | क्रमशः तीसरा अंक आता है जब आत्माएं और प्रकृति सिर्फ अर्धांश पवित्र (राजोप्रधान) रहती हैं | वह समय जो द्वापरयुग कहलाया जाता है विभिन्नता की शुरुआत होती है | तब नए-नए धर्म निकलने लगते हैं, आबादी और तेज़ी से बढ़ जाती है और ज़मीन की वृद्धि भी होती है | अंतिम अंक अपवित्रता और पतन का समय है, यानि कलियुग | युद्ध, अतिजान्संख्या, बार-बार आनेवाली विपदाएँ, बढती हुई बीमारियाँ, बढ़ता हुए प्रदूषण – उस समय की विशेषताएँ हैं|

चक्र के पहले २५०० साल हर विषय में एकता का समय होता है – धर्म, राज्य, भाषा, मत आदि में | आत्माओं को यह याद है की वे शरीरों से अलग हैं – आत्माभिमानी हैं |  वे दैवी गुणों से भरपूर हैं, प्रकृति पर नियंत्रण करती हैं और स्थायी सुख शान्ति का अनुभाव करती हैं | शास्त्रों में वह समय स्वर्ग या राम राज्य कहलाया जाता है | फिर अगले  २५०० साल बढती हुई विभिन्नता का समय है, जिसमें आत्माएं विकारी बनकर अपने को देह समझने के कारण प्रकृति पर नियंत्रण खो देती हैं | भ्रष्ट मतों, विचारों, धार्मिक संस्थाओं, सम्प्रदायों की संख्या  बढ़ जाती है जिससे दुःख अशांति का अनुभाव ज्यादा हो जाता है | उस समय को नरक या रावण राज्य कहते हैं | स्वर्ग और नरक इस सृष्टि के ही दो पहलू होते हैं किसी आकाश या पातळ में नहीं |

हर चक्र के नाटक का परिदृश्य समान होता है | इसमें विकास (एवलूशन) जैसी बात नहीं लेकिन बार-बार दोहरानेवाला, निरंतर आत्माओं तथा प्रकृति का पतन जो चक्कर में समय के अनुसार और तेज़ी से होता है | अंतिम दृश्य में महाविनाश होता है जो चक्र के अंत में एक ही तरह से होता है | तभी तमोप्रधान आत्माएं और प्रकृति फिर से अपनी सतोप्रधान स्थिति में लौटायी जाती है और खेल फिर से शुरू होता है |

अभिनेता और नाटक का द्रिध्य (सीनरी)
चेतन्य मनुष्य आत्माएं तथा दुसरे प्राणियों की आत्माएं इस नाटक के अभिनेता हैं जिसका दृश्य प्रकृति के ५ अचेतन्य  तत्त्वों से बनी हुई है | उसका रंग-मंच पृथ्वी है जो चारों तरफ साकार सृष्टि के अन्तरिक्ष से घेरी हुई है जिसके बाहर रूहानी स्थान अर्थात परमधाम है | परमधाम ऐसा स्थान है जिसमें आत्माएं बिना किसी अनुभाव के अक्रिय अवस्था में रहती हैं | वे क्रमशः परिदृश्य में अपनी-अपनी निर्दिष्ट भूमिकाएं पृथ्वी पर निभाने के लिए साकार सृष्टि में आती रहती हैं | यहाँ उनको साकार शरीररूपी वस्त्र मिलते हैं जो अनुभाव पाने के लिए और कर्म करने के लिए अनिवार्य हैं | आत्मारूपी अभिनेता कुछ नियमों के अधीन हैं जैसे जन्म-मरण का चक्र, चार अवस्थाओं से गुज़रना, कर्मभोग आदि | एक चक्र में उनको ज्यादा से ज्यादा ८४ जन्म, कम से कम १ जन्म मिलता है अर्थात हर आत्मारूपी अभिनेता को कम से कम एक जन्म के लिए इस खेल में भाग लेना ही पड़ता है | जो आत्मा इस रंग-मंच पर पहली बार आती है, उसको नाटक के अंत तक यहीं रहना पड़ता है अर्थात भले ही अभिनेता क्रमशः आत्माओं की श्रेणी में अपने-अपने नम्बर के अनुसार आते हैं, तो भी सभी को एक साथ नाटक के अंतिम समय में रंग-मंच को छोड़ना होता है | किसी आत्मा की भूमिका ज़्यादा लम्बी और किसी की बहुत छोटी होती हैं | यह व्यक्तिगत (इन्डविजवल) जन्मों की संख्या और उनकी अवस्था पर निर्भर होता है जो भी हर आत्मारूपी अभिनेता के लिए निश्चित है | मनुष्य आत्माओं की श्रेणी में पहली आत्मा अर्थात साकार मनुष्य पिता की भूमिका सब से लम्बी है | वे कभी इस रंग-मंच को नहीं छोड़ते | वे हर चक्र के शुरू से अंत तक इस साकार सृष्टी में रहते हैं | क्रमानुसार , श्रेणी में अंतिम आत्मा की भूमिका सब से छोटी होती है – वह तुरंत परमधाम में वापस जाने के लिए साकार सृष्टि में  आती है | जो आत्मा पहले रंग-मंच पर प्रत्यक्ष होती है, वह बाद में आनेवाली आत्मा से ज्यादा शक्तिशाली होती है | भले ही आत्मा कलियुग के अंत में आती है, फिर भी अपनी भूमिका को सतोप्रधान अवस्था में निभाने लगती है और तमोप्रधान अवस्था में समाप्त करती है | नाटक के चौथे अंक में चल रहा है, तो भी नयी आनेवाली आत्माएं सतिप्रधान अवस्था में आकर शुरू में केवल श्रेष्ट भूमिका निभाती है और सुख ही सुख का अनुभाव करती हैं |

नाटक की शूटिंग
आत्मारूपी अभिनेता और प्रकृति इस नाटक में भाग लेनेवाली दो विनाशी शक्तियां हैं अतः नाटक भी अविनाशी होना चाहिए | नाटक कभी किसी के द्वारा नहीं रचा गया है, परन्तु इसमें एक प्रकार की शूटिंग का समय निश्चित होता है | वह नाटक का अंतिम १०० साल हैं जो कलियुग और सत्युग के बीच परिवर्तन का समय है जिसको संगमयुग कहते हैं | तब निर्देशक भी रंग-मंच पर मौजूद होता है | उन १०० सालों में सब आत्माएं फिर से अपनी-अपनी भूमिकाओं (सद्गुण, अवगुण, सम्बन्ध-संपर्क आदि) से पूरित होती हैं | उन १०० सालों में जिनमें नाटक के चार युगों का सार समाया हुआ है आत्माओं में सूक्ष्म रूप में हर धर्म, राज्य, परंपरा, संस्कृति, मत, शास्त्र, रीति-रिवाज आदि अर्थात सब कुछ जिसका चार युगों के दौरान अनुभाव होता है उसका रिकॉर्ड होता है | संगम युग जो पूरे नाटक की अपेक्षा बहुत छोटा है, आत्मारूपी अभिनेताओं के लिए सच्चा ज्ञान प्राप्त करने का भी समय है | तभी उनको मालूम पड़ता है की उनका असली रूप क्या है, वे कहाँ हैं, कहाँ से आते हैं, क्या कर रहे हैं आदि | वे सृष्टि का असली इतिहास और भूगोल, अपने-अपने जन्मों की कहानी, मुख्या हीरो-हेरोइने (राम और कृष्ण) को पहेचान सकते हैं और निर्देशक से भी मिल सकते हैं | संगम युग हिंसक बदलावों, तीव्र परिवर्तन, आत्माओं और प्रकृति का शोधन (प्युरफकैशन), तमोप्रधान पद्धतियों का विनाश और सतोप्रधान अवस्था में वापसी का समय होता है | अंत में ही पर्दे के पीछे से  स्वयं निर्देशक निकलता है |

नाटक का निर्देशक
जब निर्देशक – परंपिता शिव रंग-मंच पर आते हैं तब संगम्युग अर्थात ५००० वर्षों के नाटक की पुनरावर्ती रेकोर्ड शुरू होता है | निर्देशक सब आत्माओं का पिता हैं, जो एक ही पूरे नाटक को परिपूर्ण रूप से जानते  हैं | हर दृश्य, हर आत्मारूपी अभिनेता के बारे में पूरा ज्ञान होने के कारण वेही उनको सही ज्ञान दे सकते हैं और हर कल्प के चक्र में हूबहू ऐसा करता है | ज्ञान मिलने तक मनुष्य आत्माएं अपनी-अपनी भूमिकाओं से अनभिज्ञ होने के कारण बुद्धिहीन अवस्था में हैं |

निर्देशक अद्वितीय आत्मा है जिसका न अपना शरीररूपी वस्त्र है, न वे  उन नियमों के अधीन हैं जो बाकी सब आत्माओं के लिए अनिवार्य हैं | लगभग ५००० साल वे परमधाम में रहते हैं और भले ही वे संगमयुग में पृथ्वी पर मौजूद हैं तो भी अधिकांश समय तक गुप्त रूप में रहते हैं | नाटक के परिदृश्य में उसके लिए असाधारण भूमिका और कार्य नूँध होते हैं | निर्देशक अपनी भूमिकाओं को निभाने के लिए और कार्यों को पूरे करने के लिए इस नाटक के हीरो और हिरोइन के तन को काम में लाते हैं | अर्थात वे मनुष्य आत्माओं के तन में प्रवेश करते हैं | हीरो – राम का शरीर उनके लिए मुक़र्रर रथरूपी वस्त्र है | हेरोइन – कृष्ण का तन अल्पकाल का वस्त्र है | सन १९३६ से परंपिता  शिव निर्देशक  जैसे नाटक की शूटिंग का प्रबंध (मैनिज) और निरिक्षण (सूपर्वाइज़) करते हैं | साथ ही क्रमशः वे अपनी भूमिकाएँ निभाते हैं – माता की पार्ट कृष्ण के तन से; बाप, शिक्षक, सदगुरु की पार्ट – राम के तन से | वे आत्माओं को पतित से पावन बनाने के साथ ज्ञान, प्यार, आत्मिक पालन, स्थायी सुख शांति रूपी वरासत देते हैं तथा उनको मुक्ति और जीवन मुक्ति की ओर मार्ग दिखाते हैं | वे १०० सालों में तीन कार्य भी पूरे करते हैं – ब्रह्मा के रूप से नयी सृष्टि की स्थापना, शंकर के रूप से पुरानी, तमोप्रधान सृष्टि का विनाश, विष्णु के रूप से नयी, पवित्र सृष्टि का पालना | हर मनुष्य आत्मारूपी अभिनेता परंपिता शिव से मिले हुए ज्ञान और उनके कार्य अलग-अलग रूप से आत्मिक रजिस्टर में याद रखता है | नए कल्प के चक्र के दूसरे अर्धांश से लेकर वे रजिस्टर चित्रों, शास्त्रों, मूर्तियों, पूजाओं, धार्मिक अनुष्ठानों आदि के रूप में प्रत्यक्ष होते हैं अर्थात वे सब परंपिता शिव के इस छोटे संगम युग में भूमिकाओं और कर्मों की यादगार हैं |  जो रीति-रिवाज हम आज देखते हैं, वे सब पहले चक्र के संगमयुग की यादगार हैं |

यह सदा दोहरानेवाला इतिहास का सार है जिसका एक ही  सिनेरीओ होता है | वास्तव में उसका न आदि न अंत होता है या दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि उसका आदि और अंत सर्कल में एक ही बिंदु है | लगभग ५००० सालों के अन्दर उस नाटक के अभिनेता अपने-अपने कर्मों से अनभिज्ञ होते हुए अपनी-अपनी भूमिकाएँ निभाते हैं | अधिकांश समय तक उनको यह भी मालुम नहीं हो पाटा कि वे नाटक के पात्र हैं यथार्थतः उनको इस खेल में भाग लेना ही होगा जिसमें उनको चार अवस्थाओं से गुज़रकर तमोप्रधान तक जाना ही होगा | वे यह भी नहीं जानते कि वे अपनी-अपनी भूमिकाएं पहले ही निभाते थे तथा भविष्य में वे फिर से उन्हें निभाते रहेंगे |

एन्त्रोपी (उत्क्रम माप ) जो वैज्ञानिक लोग प्राकृतिक प्रक्रियाओं की विशेषता मानते हैं इस नाटक में हर बात के लिए लागू होता है, चाहे भौतिक चाहे आत्मिक स्तर पर | यह चक्र में सतोप्रधान से तमोप्रधान बन्ने के लिए अनुरूप होता है | जब आत्माएं प्रकृति के संपर्क में आती रहती हैं उनकी शक्ति क्षीण हो जाती है | उस प्रक्रिया  में वे पहले प्रकृति से अलगाव का अनुभाव खो देती हैं और समय के अनुसार प्रकृति पर किसी रूप में नियंत्रण नहीं कर सकतीं | दूसरी ओर प्रकृति अर्थात पांच तत्त्व इस्तेमाल में होने के कारण ज्यादा से ज्यादा ऐसे रूपों में बदल जाते रहेत हैं जिनका प्रयोग नहीं हो सकता | जैसे एक बार प्रयोगित गतिज ऊर्जा  यांत्रिक कार्यों के लिए प्रयोग नहीं किये जा सकते | दूसरे शब्दों में कल्प चक्र की परिक्रमा के साथ प्रदूषण बढ़ जाता है | आत्माओं का प्रदूषण प्रकृति की स्थिति में प्रतिबिम्बित होता है और प्रकृति का प्रदूषण आत्माओं की स्थिति पर बुरा असर डालता है |  प्रदूषण की बढ़ोत्तरी के साथ जीवन के अनुभाव बिगड़ जाते हैं जो जीवन हर क्षेत्र में प्रत्यक्ष हो जाता है, चाहे एक व्यक्ति, चाहे समूह, चाहे समाज या सारी दुनिया  की आबादी के दृष्टिकोण से देखा जाये | हर चीज़, हर सम्बन्ध, हर संगठन या संस्था इस नियम की अधीन होती है | “सब कुछ नया सुखदायी, सब कुछ पुराना दुखदायी होता है |” बढती हुई अव्यवस्था, संघर्ष, विभाजन, विविधता, भूक, अभाव, बीमारियाँ, विपत्तियाँ आदो आत्मिक और भौतिक चक्रीय प्रदूषण की निशानियाँ हैं | आत्माओं में पांच विकार मौजूद हैं और पांच तत्त्व विनाशकारी बनते हैं |

“हर एक मनुष्य मात्र को, हर चीज़ को सतो, रजो, तमो में आना होता है. […] नए को पवित्र, पुराने को अपवित्र कहेंगे.|” [शिवबाबा]

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